बारिश में फिर मुलाकात |

पुणे की बारिश हमेशा अधूरी कहानियों को फिर से जिंदा कर देती है।

तीन साल बीत चुके थे।
एफ.सी. रोड अब पहले से ज्यादा चमकदार हो गया था। नए कैफ़े खुल गए थे, सड़कें थोड़ी बदल गई थीं, लेकिन बारिश… वो आज भी वैसी ही थी।

कबीर भी बदल गया था।

अब वो पहले वाला शांत और टूटा हुआ लड़का नहीं रहा। शहर की एक बड़ी डिज़ाइन कंपनी में काम करता था। चेहरे पर हल्की दाढ़ी, आँखों में ठहराव, और दिल में कहीं दबा हुआ एक नाम — रिया।

उस शाम ऑफिस से निकलते वक्त अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। लोग भागकर दुकानों के शेड के नीचे खड़े होने लगे।

कबीर भी एक छोटे से कैफ़े के बाहर रुक गया।

बारिश बहुत तेज थी। हवा में वही पुरानी मिट्टी की खुशबू थी।

और तभी…

“आप अब भी बारिश से दोस्ती रखते हो?”

कबीर जैसे अचानक जम गया।

वो आवाज़…
उसे पहचानने में एक पल भी नहीं लगा।

उसने धीरे से पीछे मुड़कर देखा।

रिया।

सफेद शर्ट, भीगे बाल, और वही आँखें… जिनमें कभी उसने अपना पूरा शहर देखा था।

कुछ पल दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे।
जैसे वक्त अचानक पीछे लौट आया हो।

रिया हल्का सा मुस्कुराई।

“इतने साल बाद भी ऐसे ही चुप रहोगे?”

कबीर ने गहरी सांस ली।
“तुम सच में हो… या पुणे की बारिश फिर मुझे पागल बना रही है?”

रिया हँस पड़ी।
वही पुरानी हँसी।

और उसी पल कबीर को एहसास हुआ — कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलतीं।

दोनों कैफ़े के अंदर आकर बैठ गए। बाहर बारिश लगातार कांच पर गिर रही थी।

“कैसे हो?” रिया ने पूछा।

“ठीक हूँ। तुम?”

“दिल्ली चली गई थी… लेकिन दिल शायद यहीं रह गया था।”

कबीर ने नजरें झुका लीं।

कुछ खामोशियाँ ऐसी होती हैं जिनमें हजार बातें छिपी होती हैं।

कॉफी आ चुकी थी, लेकिन दोनों में से किसी ने हाथ नहीं लगाया।

“शादी हो गई?” रिया ने अचानक पूछा।

कबीर हल्का सा मुस्कुराया।
“नहीं। किसी ने एफ.सी. रोड पर दिल तोड़ा था ना… रिस्क लेना बंद कर दिया।”

रिया की आँखों में हल्की नमी उतर आई।

“अब भी नाराज़ हो?”

“तुमसे? कभी नहीं।”

“फिर इतना दूर क्यों हो गए?”

कबीर कुछ पल चुप रहा।
फिर धीरे से बोला —

“क्योंकि कुछ लोग वापस नहीं आते।”

बारिश और तेज हो गई।
रिया खिड़की के बाहर देखने लगी।

“मैं वापस आना चाहती थी,” उसने धीमी आवाज़ में कहा।
“लेकिन जिंदगी हर बार मौका नहीं देती।”

“और अब?”

रिया उसकी तरफ मुड़ी।

“अब मैंने मौका खुद लिया है।”

कबीर उसकी बात समझ नहीं पाया।

रिया ने बैग से एक छोटा सा पुराना पेपर निकाला।
वो वही बिल था… वैषाली कैफ़े का। जिस दिन दोनों पहली बार साथ कॉफी पीने गए थे।

“मैं इसे हमेशा अपने पास रखती थी,” रिया बोली।
“ताकि खुद को याद दिला सकूँ कि कहीं एक शहर है… जहाँ मेरा दिल अब भी रहता है।”

कबीर की आँखें भर आईं।

इतने सालों का दर्द, इंतजार और अधूरी बातें उस बारिश में धीरे-धीरे बहने लगीं।

“तुम बदल गई हो,” कबीर ने कहा।

रिया मुस्कुराई।
“नहीं… बस इस बार जाने नहीं आई।”

दोनों फिर उसी एफ.सी. रोड पर निकल पड़े।

बारिश हल्की हो चुकी थी। सड़क की लाइट्स पानी में चमक रही थीं। लोग हँसते हुए गुजर रहे थे। कोई गिटार बजा रहा था।

सब कुछ बिल्कुल वैसा ही था…
जैसे वक्त ने उनकी कहानी को वहीं रोककर रखा था।

चलते-चलते रिया अचानक रुक गई।

“एक बात पूछूँ?”

“हम्म?”

“अगर मैं उस दिन नहीं जाती… तो क्या होता?”

कबीर कुछ सेकंड उसे देखता रहा।
फिर हल्का सा मुस्कुराया।

“शायद आज भी हम इसी रोड पर लड़ रहे होते कि कॉफी कौन देगा।”

रिया हँसते-हँसते रो पड़ी।

कबीर ने पहली बार उसका हाथ फिर से पकड़ा।

इस बार पकड़ थोड़ी मजबूत थी।
जैसे अब दोनों खोना नहीं चाहते थे।

बारिश की कुछ बूंदें अब भी गिर रही थीं।
लेकिन इस बार उनमें उदासी नहीं थी।

उस रात पुणे ने फिर एक अधूरी कहानी पूरी होते देखी।

एफ.सी. रोड की रोशनी के बीच चलते हुए कबीर ने धीरे से कहा —

“कुछ मोहब्बतें खत्म नहीं होतीं…
बस बारिश का इंतजार करती हैं।”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *